SHARE

स्टार रेटिंग – 1.5/5

मुंबई।ब्रदर्स देखने की कुछ वजहें हो सकती हैं तो पहले उन्हें जान लीजिए। अगर आपको लगता है कि आपके पास बहुत सारा फालतू समय है बिना परिश्रम से अर्जित किया धन है और अपनों के साथ हंसी-खुशी के पल बिताना मायने नहीं रखता तो ब्रदर्स आपके लिए है।ऊंची दुकान और फीका पकवान मुहावरे का अर्थ आपको नहीं पता तो यह फिल्म समझा देगी।

week-story-and-worst-movie-of-akshay-kumar-movie-brother

आजादी की अमिट तारीख पर अगर दिमाग और दिल को मनोरंजन के नाम पर ऊबाऊ, थकाऊ और बेसिर-पैर की फिल्म से कैद कर लेना चाहते हैं तो इसे जरूर देखिए।तुक्का लगना क्या होता है, यह समझने के लिए भी ब्रदर्स देखी जा सकती है।आप जान जाएंगे कि अग्निपथ (2012) में कैसे बॉक्स ऑफिस पर निर्देशक करन मल्होत्रा का तुक्का लगा था।

ब्रदर्स इसका भी उदाहरण है कि नकल करते हुए मूल फिल्म को कैसे हास्यास्पद बनाया जा सकता है।टिकट विंडो खुले हैं।ब्रदर्स 2011 की अमेरिकी फिल्म वारियर्स का अधिकृत रीमेक है।ऐसा नहीं कि यह फिल्म वहां बड़ी हिट थी।इसने बॉक्स ऑफिस पर केवल लागत के बराबर ही धन निकाला था।वास्तव में ब्रदर्स को देखते हुए आपको स्वर्गीय मनमोहन देसाई की याद आती है।

एक अभागे पिता (प्राण) से जन्मे दो बेटों (अमिताभ बच्चन-शशि कपूर) की प्रतिद्वंद्विता और प्यार की कहानी, जिसे मां (निरुपा रॉय) की ममता की चाशनी में डुबाने की गुंजायश हो और उस पर मार्शल आर्ट या बॉक्सिंग का रिंग हो।देसाई अपनी जादुई प्रतिभा से आपको साढ़े तीन घंटे तक बांधने की क्षमता रखते थे।परंतु करन मल्होत्रा की ऐसे ही कथानक वाली 158 मिनट की फिल्म आपको सीट पर पस्त और ध्वस्त कर देती है।बूढ़ा गैरी (जैकी श्रॉफ) जेल से निकला है। उसके हाथों बीवी का कत्ल हो गया था।उसके दो बच्चे डेविड (अक्षय कुमार) और मोंटी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) हैं। दोनों भाई अलग-अलग मांओं से जन्मे हैं। डेविड पिता से नफरत करता है और मोंटी प्यार।

स्ट्रीट फाइटिंग उनके खून में है। डेविड को अपनी नन्हीं बेटी…डेविड को अपनी नन्हीं बेटी की किडनी के इलाज के वास्त पैसा चाहिए।एक धनपति देश में स्ट्रीट फाइटिंग की विश्व स्तर की प्रतियोगिता कराता है और दोनों भाई उसमें उतरते हैं।यहां कहने की जरूरत नहीं कि ये ब्रदर्स ही फाइनल में पहुंचेगे और इमोशनल ड्रामे के बाद जीत एक की होगी।फिल्म में न इमोशन है न रोमांस है, न ड्रामा है और न ही ढंग का एक्शन।

ऐक्शन कुमार उर्फ अक्षय के चाहने वालों को यह फिल्म जबर्दस्त ढंग से निराश करेगी।यहां वह सदा ब्लैक एंड व्हाइट खिचड़ी दाढ़ी बढ़ाए मुंह लटकाए हुए हैं। सिद्धार्थ मल्होत्रा का चेहरा भी सदा लटका रहता है।करीना कपूर यहां जब आइटम डांस करती हैं तो आप जान जाते हैं कि सड़कछाप यानी क्या होता है। पत्नी के रोल में आईं जैकलीन फर्नांडिस के करिअर ने फिर ढलान पकड़ ली है। अभिनय के स्तर पर जैकी श्रॉफ जमे हैं।

फिल्म को यूरोपीय सिनेमा के नशे में शूट किया गया है। ढेर सारे क्लोज-अप। जो कई सेकेंड तक ठहरे हुए दर्शक के धैर्य की परीक्षा लेते हैं। ब्रदर्स का जो ड्रामा एक अच्छी बॉलीवुड फिल्म में बदल सकता था वह दर्शक के लिए बुरे अनुभव में तब्दील हो जाता है। इस स्वतंत्रता दिवस पर आप कई नकारात्मक और बुरी बातों से आजाद होने का संकल्प ले सकते हैं। उनमें बकवास, पकाऊ और थकेले सिनेमा से आजादी का संकल्प भी शामिल हो तो बुरा क्या है। सिनेमा हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा है।इसलिए धन और समय के गलत खर्च से बचने के लिए यह संकल्प जरूरी है।